गुरु महाराज का महाप्रसाद

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प्रेषक : दिशा …

हैल्लो दोस्तों, मेरा नाम दिशा है और में एक खूबसूरत शादीशुदा महिला हूँ। मुझे चुदाई का बहुत शौक है। में शादी से पहले तो इधर उधर मुहं मारकर अपना काम चला लेती थी और मुझे भी बहुत मजा आता था, लेकिन शादी के बाद तो मेरी जिन्दगी में बस मेरे पति का एक ही लंड बचा था और उससे मुझे पूरी संतुष्टि नहीं मिलती थी। दोस्तों शादी से पहले तो मैंने खूब मजा किया था, लेकिन शादी के बाद तो मेरी जिन्दगी में जैसे कुछ बचा ही नहीं था। फिर मैंने मेरी सहेली को सब बताया और इस बारे में बात की तो उसने मुझे एक आश्रम के बारे में बताया तो वो सब सुनकर मेरी ख़ुशी का तो कोई ठिकाना ही नहीं था। फिर उसने मुझे उस आश्रम का पता बताया और अगले ही दिन घर पर बहाना बनाकर में उस आश्रम में चली गई।

दोस्तों वहां जाते ही में में वहाँ की शिष्या रत्ना जी से मिली और उन्हें अपने बारे में सब कुछ बता दिया। फिर वो मुझे लेकर एक कमरे में गई और उन्होंने मुझे पूरी नंगी होने के लिए कहा तो मैंने भी झट से अपने पूरे कपड़े उतार दिये। फिर उन्होंने मुझे एक वस्त्र पहनाया, जिसमें से मेरा पूरा बदन दिख रहा था और मुझे शरबत पिलाया, जिससे जिस्मानी भूख बड़ जाती है। फिर उन्होंने मुझे एक कलश दिया मुझे सब कुछ समझा दिया। फिर वो मुझे लेकर एक शिष्य के पास लेकर गई और उसने अपने सामने खड़ी करके मेरे नंगे शरीर के एक-एक अंग को बड़ी तसल्ली से निहारा और फिर मुझे अपने सीने से लगाकर चूमते हुए कहा कि तुम बहुत खूबसूरत हो, मगर तुम्हारी गांड तुम्हारे शरीर का सबसे सुंदर हिस्सा है और यह कहते हुए वो मुझे अपनी बाहों में लेकर बिस्तर तक लाया। तब तक रत्ना जी उस कमरे बाहर चली गई थी। अब मैंने बिस्तर पर सीधी लेटकर अपनी दोनों टाँगे फैला दी थी, ताकि मेरी चूत बेपर्दा हो जाए। अब वो बड़ी उत्सुकता से मेरी हरकतों को देख रहा था। अब में तो बिल्कुल ही निर्लज्ज वेश्या सी हरकतें कर रही थी, आ जाओ प्लीज, अभी काफ़ी लोगों के पास जाना है।

फिर मैंने उनसे निवेदन किया, तो उसने आगे बढ़कर मेरी चूत के ऊपर अपना एक हाथ रखा और बोला कि अद्भुत, अपूर्वा, अती सुंदर। अब वो मेरी चूत को अपनी मुट्ठी में भरकर मसलने लगे थे। फिर उसके बाद 1-2 नहीं अपनी पूरी 4 उंगलियाँ मेरी चूत के अंदर डाल दी। अब में उनके एकदम से हुए हमले से चीख उठी थी उफफफफफ्फ, म्‍म्म्ममममम। अब मेरे मुँह से उत्तेजित आवाज़ें निकलने लगी थी। फिर मैंने अपने हाथों से उनकी धोती के ऊपर से उनके लंड को टटोला, उनका हथियार काफी तगड़ा था और पूरी तरह उत्तेजित हो चुका था, उनका लंड काफी बड़ा और मोटा था। अब वो मेरी चूत को मसलते हुए अपनी पूरी हथेली मेरी चूत में डालने लगे थे और जब अपना हाथ बाहर निकाला तो उनका पूरा हाथ अब तक के मिलन की कहानी कह रहा था।

फिर उन्होंने कहा कि तुम्हारी चूत का तो बहुत ही बुरा हाल है प्रिय, तुम्हारे ये जो सामने दो फूल खिले है में इनमें ही अपना लंड रगडूंगा और फिर उसने मुझे अपने सामने बैठा लिया और अपने लंड को मेरी दोनों बड़ी-बड़ी चूचीयों के बीच में रखकर उन्हें भींचने का इशारा किया। अब में अपने दोनों बूब्स के बीच में उनका लंड दबाकर अपनी चूचीयों के बीच में बनी जगह में उसके लंड को रगड़ रही थी। उसका लंड काफ़ी गर्म था, अब उनका लाल रंग का सुपाड़ा हर धक्के के साथ मेरे दूध की तरह सफेद चूचीयों के बीच में किसी गेंद की तरह उभर आता था और फिर कुछ देर में वापस उनके बीच कहीं खो जाता था। फिर थोड़ी देर के बाद मेरी चूत से रस की धार बह निकली, जो मेरी जांघों को भिगोती हुई जमीन तक सरक रही थी। फिर काफ़ी देर तक इसी तरह से करने के बाद उन्होंने मुझे उठाया और अपनी गोद में बैठाकर मेरे निप्पल को चूसने लगे और बीच-बीच में अपने दाँतों से भी काटते जा रहे थे।

अब मेरे मुँह से आह, उम्म्म्म जैसी आवाज़ें निकल रही थी। फिर काफ़ी देर तक वो ऐसे ही चूसते रहे। अब मुझे ऐसा लग रहा था मानो वो एक बच्चे बन गये हो। फिर आख़िर में मुझे उनके सिर को पकड़कर अपने बूब्स से जबरदस्ती ही हटाना पड़ा। अब वो अभी भी उन बूब्स को छोड़ने के मूड में नहीं थे। फिर मैंने देखा तो मेरे दोनों स्तन उनके ऊपर हुए हमलों से सुर्ख लाल हो गये थे और निप्पल फूल-फूलकर भारी-भारी हो गये थे। फिर उन्होंने मुझे घुटनों के बल बैठाकर उनके लंड को अपने मुँह में लेने का इशारा किया। अब में उनकी आज्ञा के अनुसार उनके सामने बैठ गयी थी और उनके लंड के सामने के सुपाड़े को अपने मुँह में लेकर चूसने लगी थी। उनका सूपाड़ा ही इतना बड़ा था कि मेरा पूरा मुँह भर गया था। अब में उसे अपने मुँह में अंदर बाहर कर रही थी और साथ-साथ अपनी जीभ को उनके सुपाड़े के ऊपर फैर रही थी। अब मेरी हरकतों से वो काफी उत्तेजित हो गये थे।

फिर उन्होंने मेरे सिर को अपने हाथों से सख्ती से थाम लिया और पूरी ताकत से मेरे मुँह में अपने लंड से धक्के देने लगे, ताकत चाहे कितनी भी तेज क्यों ना हो? मुँह में इतनी जगह ही नहीं थी कि उनके उस खंभे के समान लंड को समा सके। अब उनका लंड आधा भी अंदर नहीं जा पा रहा था। फिर उन्होंने मेरे सिर को ऊपर की तरफ इस तरह मोड़ा कि मेरा मुँह और गला एक दिशा में खुले। फिर मैंने अपने मुँह को जितना हो सकता था उतना खोल दिया, जिससे उनके लंड को अंदर प्रवेश करने में कोई परेशानी नहीं आए। फिर उन्होंने मुस्कुराते हुए अपने खड़े मूसल जैसे लंड को मेरे मुँह में डालना शुरू किया। अब उनका लंड एक-एक इंच सरकता हुआ मेरे मुँह में जा रहा था और मुझे ऐसा लग रहा था कि मेरे तपते बदन को ठंडक पहुँच रही हो, अब मेरे बदन की सिहरन शांत होती जा रही थी।

अब में उनके मारे हुए धक्कों से बुरी तरह हिल रही थी। अब मेरी जीभ दर्द से तालू से चिपक गयी थी। अब उनके काफी ज़ोर लगाने के बाद भी उनका लंड मेरे गले के अंदर नहीं उतर पा रहा था। फिर उन्होंने मुझे अपनी बाहों में किसी बच्चे की तरह उठाया और दीवार के पास जमीन पर बैठा दिया। फिर इस पोज़िशन में दीवार का सहारा लेकर वापस मेरे मुँह में अपने लंड से हमला बोल दिया। अब इस अवस्था में मेरा सिर दीवार से सटा होने के कारण हट नहीं पा रहा था और उनको अपना पूरा ज़ोर लगाने की आज़ादी मिल गयी थी। अब ऐसा लग रहा था कि आज उनका वो खंभे की तरह तना हुआ लंड मेरे गले को चीरकर रख देगा, मगर अब में धीरे-धीरे अभ्यस्त हो गयी थी। अब हर धक्के के साथ मेरा सिर जोर से दीवार पर टकरा रहा था। फिर जब वो अपने लंड को बाहर खींचते तो मेरा सिर उनके साथ ही आगे बढ़ जाता। फिर करीब 15 मिनट तक इस तरह से मेरे मुँह को चोदने के बाद उन्होंने अपना लंड बाहर निकाला।

अब वो वापस से मेरे दोनों बूब्स को पकड़कर उनके बीच में अपना लंड रखकर मेरे बूब्स को एक तरह से चोदने लगे थे। अब मैंने अपने दोनों बूब्स को सख्ती से उनके लंड पर दबा रखा था, जिससे उन्हें चूत जैसा मज़ा मिले। फिर कुछ देर तक इस तरह से अपना लंड रगड़ने के बाद उन्होंने अपना ढेर सारा वीर्य मेरे चेहरे पर और बूब्स पर डाल दिया। अब मैंने अपने चेहरे के नीचे कलश को लगा रखा था। अब उनका वीर्य मेरे चेहरे से टपकता हुआ कलश में इकट्ठा हो रहा था। फिर उनका लंड शांत हो जाने के बाद मैंने अपनी उंगलियों से अपने बूब्स पर और अपने गले पर लगे उनके वीर्य को कलश में डाला। अब मेरा सिर बुरी तरह दुख रहा था। फिर में उठते हुए लड़खड़ाई तो तब उन्होंने मुझे अपनी बाँहों में थाम लिया। अब मेरे पैरो में जान नहीं बची थी। फिर उन्होंने मुझे सहारा देकर उठाया। फिर में लड़खडाते हुए कदमों से दरवाजे के बाहर इंतज़ार कर रही रत्ना जी के पास पहुँची।

फिर में उनका सहारा लेकर आगे बढ़ी। फिर मैंने उनसे कहा कि अब कुछ देर आराम कर लें? पूरा बदन टूट रहा है। तब उन्होंने कहा कि अरे अभी शाम तक काफ़ी संभोग बाकी है, अभी तो कुछ भी नहीं हुआ, एक बार और एक के साथ हो लेते है, फिर आराम कर लेना और फिर रत्ना जी ने मुझे ढाढ़स दिलाया और इसके बाद हम एक और शिष्य के पास गये, जो काफ़ी कमजोर लग रहा था। फिर मैंने उनके कमरे में पहुँचकर उनसे प्रण निवेदन की। फिर उन्होंने अपनी धोती उतारी तो मैंने देखा कि उनका लंड तो तगड़ा है, लेकिन उसमें तनाव नहीं है। फिर उन्होंने मुझे उसे खड़ा करने को कहा तो मैंने पहले तो उसे अपने हाथ में लेकर सहलाया, लेकिन कोई असर ना होता देख मैंने उसे अपने मुँह में लेकर चूसना शुरू किया और साथ-साथ में उनके अंडकोषों को भी सहलाती जा रही थी। दोस्तों ये कहानी आप कामुकता डॉट कॉम पर पड़ रहे है।

फिर जब ज़्यादा कोई असर नहीं हुआ तो मैंने उनको मेरे बदन को मसलने के लिए कहा। तब उन्होंने मेरी दुखती हुई चूचीयों को मेरे भारी-भारी नितंबों को और मेरी इतनी ठुकाई झेल चुकी चूत को बुरी तरह मसलना शुरू किया। तब काफ़ी कोशिशों के बाद उनके लंड में कुछ तनाव आया। तब में उसे जैसे तैसे अपनी चूत में लेकर खुद ही धक्के मारने लगी। अब बार-बार उनका लंड मेरी गीली चूत से फिसलकर बाहर आ जाता था। फिर कुछ ही धक्कों में उन्होंने अपना पानी छोड़ दिया, जिसे मैंने अपने उस कलश में इकट्ठा कर लिया था। अब संभोग तो मुश्किल से 3-4 मिनट ही किया होगा, लेकिन उस थोड़े से समय में मेरे पूरे बदन को तोड़ मरोड़ कर रख दिया था, उनके दाँतों के निशान मेरे बूब्स पर और मेरी जांघों पर चमक रहे थे। फिर में उठकर बाहर आई, अब मुझमें और हिम्मत नहीं थी कि किसी और के पास जाऊं। में सुबह से दो लोगों से संभोग कर चुकी थी और कुछ लोगों ने तो मुझे बुरी तरह से तोड़कर रख दिया था। अब मेरा एक-एक अंग फोड़े की तरह दुख रहा था।

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फिर मैंने रत्ना जी से असमर्थता जताई तो तब उन्होंने इशारा किया, तो दो सेवक मुझे नंगी हालत में दोनों तरफ से सहारा देते हुए एक कमरे में ले गये। वहाँ खूबसूरत सा एक बिस्तर लगा हुआ था। फिर रत्ना जी मेरे लिए तरह तरह का नाश्ता लेकर आ गयी। फिर मैंने नाश्ता करके वापस वहीं शरबत पिया, जिससे जिस्मानी भूख बढ़ जाती है। फिर रत्ना जी ने मुझे बिस्तर पर लेटाकर एक चादर से मेरे नंगे बदन को ढक दिया। फिर वो मुझे लेटाकर कमरे से बाहर निकल गयी। अब में गहरी नींद में डूब गयी थी। अब में सपने में भी अपने आपको किसी के द्वारा भोगे जाते हुए ही देख रही थी। फिर काफी देर के बाद रत्ना जी के पुकारे जाने पर ही मेरी नींद खुली। अब एक नींद लेने के बाद मेरे शरीर में काफी ताजगी आ गयी थी। में सुबह से उन दोनों शिष्यों से संभोग करते हुए करीब 3 बार स्खलित हुई थी, किसी सामान्य महिला के लिए ये एक काफ़ी मुश्किल बात है।

फिर रत्ना जी ने मुझे वापस से उन्ही वस्त्रों को पहनाया। अब मेरे पूरे बदन पर और उन वस्त्रों पर वीर्य के धब्बे और पपड़िया दिख रही थी, मेरे बाल बिखरे हुए थे, वो भी वीर्य से कड़क हो गये थे। अब मुझे पूरा कार्यक्रम ख़त्म होने से पहले अपने शरीर को साफ करने या नहाने की इजाज्त नहीं थी। मुझे पूरे दिन उसी तरह रहना था। फिर रत्ना जी मुझे लेकर अगले कमरे तक गयी। अब कमरे में घुसने से पहले ही उन्होंने मुझे समझा दिया कि दिशा ये गुरु महाराज और से कुछ अलग है, इन्हें चूत से ज़्यादा गांड का शौक है, इनसे मिलने से पहले अपनी गांड में क्रीम लगा लेना, नहीं तो हालत खराब हो जाएगी, इनका लंड लंबा और पतला है, जब अंदर घुसता है तो लगता है मानो पेट फाड़कर ही निकलेगा। तो तब मैंने कहा कि दीदी क्रीम लाकर दो ना। तब रत्ना जी ने कहा कि अंदर सब मिल जाएगा, उनसे माँग लेना।

फिर में चुपचाप अंदर गयी। अब सामने जमीन पर एक महाराज बैठा था, उनकी आँखें बंद थी और वो शायद ध्यान में लीन थे। फिर मेरे अंदर आने की आवाज से उन्होंने अपनी आँख खोलकर मुझे देखा और फिर अपनी आँखें बंद कर ली। फिर में उनके सामने आकर बैठ गयी। फिर में कुछ देर तक चुपचाप हाथ जोड़कर बैठी रही। फिर मैंने अपने बदन पर ओढ़े हुए वस्त्र को हटा दिया। अब में उनके सामने पूरी तरह से नग्न बैठ गयी थी। फिर उन्होंने दुबारा से अपनी आँखें खोली तो अब मेरे बदन से उनकी नजरें चिपककर रह गयी थी। फिर मैंने आगे की तरफ झुककर उनके चरण छुए तो तब उन्होंने मेरे नग्न कंधों पर अपने हाथों को रखा और फिर उन्हें फिसलाते हुए मेरे बूब्स को छुआ और एक बार उन्हें मसलकर मेरे दोनों निप्पल को अपने हाथों से पकड़कर मसलने लगे थे। अब मेरे मुँह से उत्तेजना और दर्द से मिली जुली आआआहह, ऊहहहह की आवाज निकलने लगी थी। तब उन्होंने अचानक से मेरे दोनों निप्पल को अपनी मुट्ठियों में भरकर अपनी तरफ एक झटके से खींचा।

अब में घुटने के बल उठकर उनके समीप आ गयी थी और उनसे कहा कि आआहह स्वामी जी म्‍म्म्मममम, बस-बस आज में बहुत थक गयी हूँ। फिर मैंने अपने हाथ में पकड़े कलश को ऊपर उठाया और उनसे कहा कि प्लीज मुझे आपका प्रसाद दे दो। तो तब उन्होंने कहा कि चलो वहाँ पर रखी तेल की शीशी ले आओ। तो में उठी और अलमारी तक जाकर एक तेल की शीशी लाकर उन्हें दी। तब उन्होंने कहा कि देवी अब तुम किसी कुत्तिया की तरह अपने हाथों और पैरों के बल झुक जाओ। तब मैंने जैसा कहा वैसा ही किया तो तब मैंने देखा कि उन्होंने तेल की शीशी से कुछ तेल अपनी हथेली पर लिया और एक उंगली उसमें डुबोकर मेरी गांड के छेद पर फैरी। अब में पहले से ही इस हमले के लिए तैयार थी। फिर उन्होंने पहले एक और फिर दो उंगलियाँ मेरी गांड के छेद से प्रवेश कर अंदर तक की दीवारों पर तेल मालिश करने लगे। अब ऐसा करते समय मुझे दर्द हो रहा था। अब में बार-बार चीखकर उठने को होती तो वो जबरदस्ती मुझे वापस उसी पोज़िशन में दबा देते।

फिर मेरी गांड के बाहर और अंदर काफ़ी देर तक तेल लगाने के बाद उन्होंने अपने बदन से धोती को हटा दिया। अब उनका तना हुआ लंड देखकर मेरा कलेजा झलक गया था। उनका लंड 10 इंच के करीब लंबा था। ये लंड जब मेरी गांड में घुसेगा तो सब कुछ चीरता हुआ पेट तक चला जाएगा। तब मैंने डरते हुए उनसे कहा कि स्वामी जी आपका तो काफ़ी बड़ा है, में इसे नहीं ले पाऊँगी, ये मेरी गांड को फाड़कर रख देगा। तब उन्होंने कहा कि ऐसा कुछ भी नहीं होगा, देवी तुम डरो नहीं, में अब तक कई महिलाओं को संतुष्ट कर चुका हूँ, हाँ शुरू में हो सकता है कुछ दर्द हो, लेकिन बहुत जल्दी तुम मेरे लंड की अभ्यस्त हो जाओगी और यह कहते हुए वो पीछे से मेरे दोनों घुटनों के बीच में आ गये। अब सामने लगे बड़े से शीशे में मुझे हम दोनों का नजारा दिख रहा था। अब वो भी शीशे में मेरे नग्न बदन को मेरे झूलते हुए बूब्स को और मेरे खुले हुए होंठो को देखकर मुस्कुरा रहे थे।

फिर उन्होंने ढेर सारा तेल लेकर अपने उस मोटे लंड पर लगाया और अपने हाथों से मेरे नितंबों को फैलाकर मेरी गांड के छेद पर अपने लंड को सटाया। अब में अपने सिर को झुकाकर आने वाले दर्द का इंतज़ार कर रही थी। फिर उन्होंने अपने लंड से एक ज़ोर का धक्का मारा तो में दर्द से बिलबिला उठी उूउउइईईईईई माँ, लेकिन उनका लंड एक मिलीमीटर भी अंदर नहीं घुसा था। फिर उन्होंने वापस से मेरे नितंबों को फैलाकर एक और ज़ोर का धक्का मारा तो तब मुझे ऐसा लगा मानो आज मेरी गांड फट जाएगी, लेकिन फिर भी उनका लंड अंदर नहीं गया था। तब में ज़ोर से चीख उठी आह माँ। तो तब उन्होंने कहा कि तुम्हारी गांड बहुत टाईट है देवी। अब मेरी आँखों से दर्द से आँसू निकल आए थे। अब वो लुढ़ककर मेरे गालों तक आ रहे थे।

फिर इस बार मैंने अपने दोनों नितंबों को अपने दोनों हाथों से पकड़कर और चौड़ा किया और उन्होंने अपने हाथों से अपने लंड को मेरे छेद पर लगाकर एक ज़ोर का धक्का दिया। में दर्द से चीखने लगी उईईईईईईईईईईइ माँ, आह में मर गयी और यह कहते हुए में मुँह के बल जमीन पर गिर गयी, क्योंकि मेरे हाथ नितंबों पर थे। फिर मैंने जल्दी से अपने हाथ वहाँ से हटाकर जमीन पर टिकाए। अब उनके लंड का सुपाड़ा मेरी गांड में घुस चुका था। अब मेरी आँखें दर्द से बाहर को उभर आ रही थी। अब में घबराकर उठना चाहती थी, लेकिन वो मुझसे काफी ज़्यादा बलशाली थे। अब उन्होंने मुझे दबोचकर हिलने नहीं दिया था, मैंने इतना लंबा लंड कभी अपनी गांड में नहीं लिया था। अब मुझे ऐसा लग रहा था जैसे उनका लंड मेरे पेट को फाड़ता हुआ मेरे गले तक पहुँच जाएगा, आआहह स्वामी जी, हाईईईई स्वामी जी, प्लीज, हाईई बाहर निकालो, ऊऊओ। अब में दर्द से झटपटा रही थी। अब उन्होंने पूरी ताकत से अपने लंड को मेरी गांड में दबा रखा था।

अब में चीखी जा रही थी, मगर उन पर कोई असर नहीं हो रहा था। फिर उन्होंने अपने लंड को कुछ बाहर खींचा तो ऐसा लगा कि शायद उनको मुझ पर रहम आ गयी हो। अब में उनके लंड के बाहर निकालने का इंतज़ार कर रही थी कि उन्होंने एक और ज़ोर का धक्का मारा और अब उनका लंड आधे से ज्यादा मेरी गांड में समा गया था ओह माँ, बचाओं, हाईईई में मर जाउंगी, हे प्रभु ऊऊउ बचाओ। अब में दर्द से रोने लगी थी और दर्द से बुरी तरह झटपटा रही थी। अब वो मुझे पूचकारकर चुप करने की कोशिश करने लगे थे देवी, देवी थोड़ा धीरज रखो, बस अब थोड़ा सा ही बचा है, एक बार अंदर घुस गया तो फिर कभी दर्द नहीं होगा, अपने शरीर को ढीला छोड़ो देवी। तब मैंने गिड़गिडाते हुए कहा कि नहीं स्वामी में आपको नहीं झेल पाऊँगी, मेरी गांड फट जाएगी, मेरा दर्द से बुरा हाल है, स्वामी मुझ पर रहम करो।

तब उन्होंने कहा कि थोड़ा और सब्र करो देवी, कुछ नहीं होगा, तुम बेवजह घबरा रही हो और यह कहकर उन्होंने वापस से अपने लंड को बाहर की तरफ खींचा और अपने सुपाड़े के अलावा पूरे लंड को बाहर निकालकर वापस से एक ज़ोर का धक्का लगाया। फिर से एक तेज दर्द की लहर मेरे पूरे जिस्म को कांपती चली गयी और मेरे मुँह से ऊऊऊऊओ, माँ आआअ, ऊऊऊफफफफ्फ, आअहह की आवाज निकली और अब में जमीन पर गिर पड़ी थी। अब मेरी गांड में उनका लंड इस तरह फँस गया था कि मेरे गिरते ही उनका लंड बाहर नहीं निकला, बल्कि वो भी मेरे ऊपर गिरते चले गये थे। अब गिरने से उनके लंड का जो थोड़ा बहुत हिस्सा अंदर जाने से रह गया था, वो भी पूरा घुस गया था। तब उन्होंने कहा कि देखो अब पूरा घुस गया है, अब थोड़ी ही देर में सब कुछ अच्छा लगने लगेगा। फिर उन्होंने वापस से उठते हुए मुझे भी अपने साथ उठाकर पहले वाली पोज़िशन में किया। फिर कुछ देर तक उन्होंने अपने लंड को पूरा मेरी गांड के अंदर फँसा रहने दिया।

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फिर जब मेरा दर्द कुछ कम हुआ तो पहले धीरे-धीरे उन्होंने अपने लंड को हरकत देना शुरू किया। अब धीरे-धीरे मेरा दर्द कम हो चुका गया। फिर कुछ ही देर में वो मेरी गांड में ज़ोर-ज़ोर से धक्के मारने लगे। फिर हर धक्के के साथ वो अपने लंड को लगभग पूरा बाहर निकालते और वापस पूरा अंदर पेल देते। अब में उनके हर धक्के के साथ सिसक उठती थी, शायद मेरी गांड के अंदर की दीवार छिल गयी थी, इसलिए हर धक्के के साथ मुझे हल्का सा दर्द होने लगता था। फिर काफ़ी देर तक इसी तरह मुझे ठोकने के बाद उन्होंने अपने लंड को बाहर निकाला तो तब में झट से कलश को उनके लंड के सामने पकड़कर अपने हाथों से उनके लंड को झटके देने लगी। तो कुछ ही देर में उनके वीर्य की एक तेज धार निकली, जिसे मैंने उस कलश में इकट्ठा कर लिया था। फिर उनका सारा वीर्य निकल जाने के बाद उनका लंड लटक गया। फिर में उठी और अपने वस्त्र को किसी तरह अपने बदन पर लपेटकर बाहर निकली।

अब मेरा पूरा बदन दर्द कर रहा था, मेरी गांड तो ऐसी लग रही थी जैसे की फट गयी है। फिर में लड़खड़ाते हुए बाहर निकली और रत्ना जी की बाहों में ढेर हो गयी। तब उन्होंने मुझे सांत्वना देते हुए संभाला और मेरे बदन को सहारा देते हुए वापस उस कमरे तक ले गयी, जो मुझे रुकने के लिए दिया हुआ था। रत्ना जी को पहले से ही मालूम था इसलिए सारा इंतजाम पहले से ही कर रखा था, वहाँ सारा सामान पहले से ही मौजूद था और एक भगोनी में पानी गर्म हो रहा था। फिर उसमें किसी दवाई की दो बूँदें डालकर उन्होंने मेरी गांड की सिकाई की, तो इससे मुझे बहुत आराम मिला। फिर उन्होंने मेरे द्वारा एकत्रित किये पूरे वीर्य को खीर के प्रसाद में मिलाया और मुझे वो खीर खाने के लिए दी। मैंने भी बड़े चाव से उस खीर को खाया। दोस्तों ऐसी स्वादिष्ट खीर मैंने जिन्दगी में पहले कभी नहीं खाई थी। दोस्तों अब मुझे महाप्रसाद मिल चुका था और में उस आश्रम की सदस्य बन गई थी। अब तो मुझे वहां का कोई भी शिष्य या स्वामी भोग सकता था। अब तो मौका मिलते ही में आश्रम जाती और मजा लूटकर वापस घर चली आती थी।

धन्यवाद …

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