शादी के बाद जवान मर्दों का मजा लूटा

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प्रेषक : ऋतु …

हैल्लो दोस्तों, मेरा नाम ऋतु है और मेरी शादी को पूरे तीन साल हो चुके है। मेरा रंग बहुत गोरा, चेहरा गोल बहुत सुंदर आकर्षक और मेरा बदन बहुत कसा हुआ है, मेरे पति मुझे बहुत प्यार करते है, लेकिन ना जाने क्यों अभी तक में माँ नहीं बन पाई हूँ। वैसे मेरे पति का बदन बहुत गठीला हट्टा कट्टा बलशाली है और उनके लंड का आकार भी ठीक ठाक है, लेकिन मुझे कभी भी उनके साथ संभोग मतलब कि चुदाई में इतना खास मज़ा नहीं आता, इसकी वजह में स्वयं भी नहीं जानती। में अपनी उम्र के मर्दों की बजाए में कम उम्र के लड़कों के साथ संभोग की कल्पना करके ज़्यादा रोमांच महसूस करती हूँ और इसलिए में अपने पति की नज़र को बचाकर कई बार अपनी यह इच्छा पूरी भी कर चुकी हूँ और यह आदत मुझे मेरी किशोरवस्था में ही पड़ चुकी थी। दोस्तों में सोलह, सत्रह साल की उम्र में अपने पास पड़ोस के छोटे बच्चों को एकांत में ले जाकर उनसे अपना स्तनपान करवाने में मुझे अजीब सा सुख बहुत ख़ुशी मिलती थी और जब उन बच्चों के छोटे छोटे दाँत मेरे बूब्स और निप्पलों पर गड़ते थे तब में उत्तेजना से सिसकी भर उठती थी।

दोस्तों मेरी शादी होने के बाद तो मेरा यह शौक अब और भी ज्यादा बढ़ गया और जब में शादी होकर पहली बार अपने ससुराल आई तो यहाँ मेरे पति के अलावा उनका 18 साल का भाई जिसका नाम रविन्द्र है वो भी रहता था। वो उस समय हाई स्कूल में पढ़ता था और उस समय मेरी उम्र 24 साल थी। वैसे उम्र के लिहाज से मेरे 28 वर्षीय पति मेरे जोड़े के थे, लेकिन मेरी नजर पहले ही दिन से उनके बजाए उनके छोटे भाई पर थी और कुछ दिनों के अंदर ही मुझे रवींद्र के साथ खेलने का मौका मिल गया। दोस्तों उस दिन मेरे पति दो दिन के लिए कहीं बाहर गये हुए थे और उस वजह से घर पर में और रविन्द्र हम दोनों ही थे और रात के समय मैंने डर लगने का झूठा बहाना करके उसको अपने साथ मेरे कमरे में एक ही बिस्तर पर सुला लिया। अब रात को सोते समय मैंने जानबूझ कर मेक्सी पहनी थी और अपनी ब्रा और पेंटी को उतार दिया था। सभी काम खत्म होने के बाद लाईट के बंद होने के बाद रविन्द्र जैसे ही मेरे पास आकर लेटा तो कुछ देर बाद मैंने नाटक करते हुए अपने कपड़ों में कोई ज़हरीला कीड़ा घुसने का शोर करते हुए में ज़ोर ज़ोर से चीखने लगी और यह सिर्फ़ मेरा एक सोचा समझा नाटक था, जिसकी वजह से मेरा देवर लाइट जलाकर मेरे कपड़े हटाने को बाध्य हो जाए और हुआ भी फिर यही, क्योंकि जैसे ही मैंने झूठमूठ तड़पने का बहाना करते हुए चीखना शुरू किया, तब रविन्द्र ने घबराकर जल्दी से उठकर तुरंत ही लाइट को जला दिया और अब वो इन सभी बातों से अंजान मेरे कपड़ों को उलट पलटकर उस कीड़े को मेरे कपड़ो के ऊपर ढूँढने लगा, लेकिन दोस्तों वो कीड़ा तो खैर तब मिलता जब वो वहां पर होता और हाँ इस उथल पुथल में मेरी मेक्सी ज़रूर बदन से कुछ इस तरह सरक गई कि उसका अब मेरे गोरे कामुक बदन पर होना ना होना एक समान हो गया था। उसके सामने मेरा गोरा बदन बिना कपड़ो के उसको अपनी तरफ आकर्षित कर रहा था और वो लगातार घूर घूरकर देखता ही जा रहा था।

दोस्तों उसकी वजह ना सिर्फ़ मेरे दोनों बूब्स बल्कि मेरी दोनों जांघे कूल्हे और मेरी चूत भी पूरी तरह से खुल गई थी। वो मेक्सी एक पतले दुपट्टे की तरह मेरे गोरे पेट तथा नाभि तक सिमटकर रह गई थी। अब रविन्द्र मुझे अपनी मुग्ध, चकित नजरों से घूरने लगा था और यही सब काम तो में उसके साथ करना चाहती थी, लेकिन फिर भी मैंने नाटक करते हुए अपनी चूत को अपने दोनों हाथों से उनके पीछे छुपा लिया और में उसके सामने शरमाने का नाटक करती हुई उससे बोली कि ऐसे क्या घूरकर देख रहे हो रविन्द्र? तो रविन्द्र कुछ देर झिझकता डरता हुआ कि बोला भाभी में यह देख रहा हूँ कि तुम कितनी सुंदर हो, यह बात मुझे आज पहली बार पता चली वरना कपड़ो में तो में तुम्हे हमेशा ही देखा करता था। में तुम्हारा यह रूप देखकर बहुत चकित हूँ। अब मैंने नाटक करते हुए कहा हाए राम मुझे लज्जा आ रही है, तुम यह कैसी बातें कर रहे हो? इतना कहकर मैंने अपनी दोनों जांघे मोड़ ली उसके बाद में उससे बोली कि कम से कम तुम इस लाइट तो बंद कर दो और मेरे मुहं से यह बात सुनते ही रविन्द्र तुरंत ही बिस्तर से उठ गया और उसने लाइट को बंद कर दिया।

फिर उसके बाद जैसे ही वो मेरे पास आया तो मैंने उसको दबोच लिया। अब पूरे कमरे में थोड़ा सा अंधेरा था इसलिए मुझे शरमाने का नाटक करने की इतनी कोई ज़रूरत नहीं थी और इसलिए मैंने रविन्द्र को अपनी बाहों में भरा और में मर्दाने अंदाज में उस पर छा गई जिसकी वजह से वो मेरी तेज़ी से घबरा गया था, लेकिन मैंने इस बात की बिल्कुल भी परवाह नहीं की और मैंने खुद ही अपनी कमर को चलाकर संभोग क्रिया ओ संपन्न किया और कुछ देर बाद में झड़ जाने के बाद शांत हो गई और उसके बाद मैंने कई बार रविन्द्र के साथ उसके तो कभी मेरे तरीको से संभोग का पूरा पूरा मस्त मज़ा लिया और उसके साथ साथ अपनी भी जवानी का भरपूर आनंद उठाया, लेकिन मेरी इस बेकार किस्मत की वजह से दो वर्ष के बाद ही वो अब अपनी आगे की पढ़ाई को पूरा करने के लिए बाहर चला गया। अब में उसके चले जाने की वजह से बहुत उदास रहने लगी थी। उस समय मेरे पति मेरे भी मेरे पास ही थे, लेकिन उनके साथ मेरा सेक्स संबंध मात्र एक औपचारिकता था, वो बस एक दिखावा था, क्योंकि मुझे उनके साथ संभोग क्रिया में रत्ती भर भी मज़ा नहीं आता था और फिर ऐसे ही समय गुजर रहा था। में जैसे तैसे उदास रहकर अपने दिनों को गुजार रही थी, क्योंकि मुझे इस बीच अब तक कोई भी ऐसा नहीं मिला था जो मुझे कुछ मज़ा दे सके, लेकिन अब भी मेरी तलाश वैसे ही चल रही थी, मुझे किसी का इंतजार था जो मेरी प्यासी चूत को शांत कर सके। दोस्तों अभी चार महीने पहले की बात है मेरी बड़ी ननद ने अपने बेटे जिसका नाम शेखर था, उसको हमारे पास पढ़ने के लिए भेज दिया और शेखर को पहली बार देखते ही मेरी आखों में वो ख़ुशी की चमक दोबारा आ गई और मेरे दिल में कई महीनों से दबी वो प्यास जाग उठी।

दोस्तों शेखर का बदन बहुत गठीला था और अभी तक उसके दाढ़ी मूँछ भी नहीं आई थी। में अब मन ही मन बहुत खुश होकर कल्पना करने लगी थी कि कब मुझे वो अच्छा मौका मिले और में इस लड़के को अपनी बाहों में भरकर मसल डालूं? और एक दिन एकांत में मैंने शेखर को उलझाने के लिए अपना जाल बिछा दिया। वो गर्मी का मौसम था, मैंने ब्रा और पेटीकोट के अलावा अपने सभी कपड़े उतार दिए और फिर में खुश होकर बिस्तर पर लेट गई, तभी शेखर मुझे मेरे कमरे की तरफ आता हुआ नजर आया और उसको देखते ही मैंने अपना पेटिकोट जाँघो तक ऊपर उठा लिया और अपनी दोनों जांघे घुटनों से मोड़कर इस तरह मैंने अपने पैरों को पसार लिया जिसकी वजह से कमरे में पहला कदम रखते ही शेखर की वो पहली नज़र बस सबसे पहले मेरी चूत पर पड़े। फिर मैंने अपने एक बूब्स को ब्रा से बाहर किया और में उसी हालत में गहरी नींद का नाटक करते हुए अपनी दोनों आखों को में बंद करके चुपचाप लेट गई। तो उसके बाद अंदर आते ही मामी जी, मामी जी शेखर ने दो बार मुझे आवाज़ दी, लेकिन में तो जानबूझ कर उससे कुछ नहीं बोली, जिसकी वजह से उसको मेरी गहरी नींद का पूरी तरह से विश्वास हो जाए और फिर मुझे सोती हुई देखकर शेखर का मन अब भटक ही गया। यह सब स्वभाविक था, क्योंकि दोस्तों आप ही मुझे बताए कि एक जवान सुंदर औरत के बिना कपड़ो के खुले हुए गोरे अंगों को देखकर कौन युवक विचलित नहीं होगा? और यह भी सही है कि शेखर अभी अभी जवान ही हुआ था। वो इतना छोटा बच्चा भी नहीं था।

अब वो धीरे से मेरे बिस्तर पर बैठ गया और मेरे खुले हुए बूब्स पर वो अपने हाथ को घुमाने लगा था और फिर कुछ देर बाद जब उसको मेरी तरफ से कोई भी विरोध हलचल महसूस नहीं हुई तो अब हिम्मत करके नीचे झुककर उसने अपने होंठो को मेरे निप्पल पर रख दिए। फिर उसके यह सब करने की वजह से में सिसक उठी और उसके नरम होठों का स्पर्श पाकर मेरे बूब्स के निप्पल अब पहले से ज्यादा तन गए थे। मुझे उसके यह सब करने की वजह से बड़ा मस्त मज़ा आ रहा था और कुछ देर तक मेरे निप्पल को चूसने के बाद बो मेरे बूब्स को अब धीरे धीरे अपने दाँतों से कुरेदने लगा था। में उसकी हरकतों की वजह से समझ चुकी थी कि वो अब जोश में आने लगा है। दोस्तों अब तो उसके साथ साथ मेरे ऊपर भी उत्तेजना का बुखार चढ़ने लगा था और बहुत देर तक शेखर मेरे बूब्स से ही खेलता रहा तो मुझे अब कुछ बोरियत सी महसूस होने लगी थी इसलिए मैंने नींद में ही करवट लेने का बहाना किया और इस काम को करते समय मैंने अपने पेटीकोट को पूरी तरह अपनी कमर के ऊपर सरका लिया था, जिसकी वजह से अब मेरी भरी हुई जांघे और गोरे गोलमटोल कूल्हे पूरी तरह बेपर्दा हो गये थे और मेरी यह चाल एकदम सफल हुई और मेरे बड़े आकार के कूल्हों को देखकर शेखर एकदम से ललचा गया। उसके बाद वो मेरे पैरों के पास आकर बैठ गया और ठीक उसी समय मैंने दोबारा से अपनी करवट को बदल लिया और में अब एकदम सीधी होकर लेट गई। अब मेरी चिकनी उभरी हुई गुलाबी चूत शेखर की आखों के ठीक सामने थी। अब शेखर ने अपने एक हाथ को मेरी एक जाँघ पर रखा और वो उसको सहलाते सहलाते कुछ देर बाद चूत पर आ गया। में उसकी नज़र बचाकर उसको बीच बीच में देख भी रही थी और फिर में दोबारा नींद का बहाना करके लेट जाती थी। दोस्तों ये कहानी आप कामुकता डॉट कॉम पर पड़ रहे है।

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तभी अचानक से शेखर अब उठकर खड़ा हो गया और वो अपनी पेंट को खोलने लगा। जैसे ही उसकी पेंट नीचे सरकी तो मैंने अपनी अधखुली आखों से उसको देखा। उसके दोनों पैरों के बीच में झूलते हुए उसके लंबे मोटे लंड को देखकर में ख़ुशी से झूम उठी क्योंकि दोस्तों अब तक जिस शेखर को में मन ही मन में बच्चा समझ रही थी वो तो अब पूरा एक मर्द बन चुका था, क्योंकि उसके लंड के आसपास उगे वो उसकी झांटो के बाल इस बात की गवाही दे रहे थे कि ना केवल उस पर जवानी पूरी तरह से आ चुकी है बल्की वो किसी भी एक जवान औरत को पूरी तरह से संतुष्ट करने के लायक भी हो चुका है। दोस्तों जिस तरह भरे हुए गोल बूब्स और कसे हुए गोरे बदन बड़े आकार के कूल्हों वाली किसी युवती को देखकर एक जवान युवा लड़के के लंड में फड़क होने लगती है ठीक उसी तरह किसी स्वस्थ शरीर और मस्त लंड वाले नंगे पुरुष के सामने आते ही युवा औरतों के बूब्स और उनकी चूत में एक सिहरन पैदा हो जाती है, वैसा ही मेरा साथ भी उस समय हो रहा था, क्योंकि यह सब प्रक्रति का एक नियम है। दोस्तों शेखर के उस दमदार तनकर खड़े लंड को देखकर मेरे बूब्स और चूत में सिहरन होना शुरू हो गई थी और अब मेरी बहुत इच्छा हो रही थी कि वो अपने लंड को जल्दी से मेरी चूत में प्रवेश करा दे। मेरी आज वो जमकर मस्त मजेदार चुदाई करे, लेकिन तभी मैंने महसूस किया कि उसकी इतनी हिम्मत नहीं थी, शायद वो मेरी नींद खुल जाने का ख़तरा महसूस कर रहा था और इसलिए वो खुद को नंगा करने के बाद भी मेरे नंगे बदन से लिपटने की बजाए वो धीरे से मेरी कमर के पास आकर बैठ गया।

फिर उसने अपना एक हाथ मेरी जांघो के बीचो बीच रख दिया और मैंने नींद का बहाना करते हुए अपनी दोनों जाघों को पूरी तरह से फैला दिया, जिसकी वजह से शेखर का वो हाथ सीधा मेरी चूत तक पहुंच जाए। फिर शेखर ने जब मेरी जवान चूत को ध्यान से पूरा खुला हुआ देखा तो वो बिल्कुल बेकाबू हो गया और वो धीरे धीरे मेरी चूत को मसलने लगा था और फिर वो अपनी एक उंगली से मेरी चूत को खोदने भी लगा था, उसकी इन हरकतों की वजह से मेरी चूत पहले ही पूरी भीग चुकी थी और इस गीलेपन को देखकर शेखर का मन मचल गया और उसने अपनी उंगली को मेरी चूत की दोनों फांको के बीच में सरका दिया और अपने भांजे की उन हरकतों से मुझे बहुत ही आनंद आ रहा था और जब उसने अपनी उंगली को मेरी चूत के अंदर कुछ देर सरकाने के बाद आगे पीछे करना शुरू किया। तब तो मेरी चूत में एक अजीब सी सरसराहट फैल गई थी, लेकिन उसकी पतली 2.5 इंच लंबी उंगली मेरी चूत की भूख को ठीक तरह से मिटा नहीं पा रही थी। अब में मन ही मन ऊपर वाले से दुआ कर रही थी कि काश अब शेखर उंगली की बजाए अपने उस मर्दाने अंग को मेरे गुप्ताँग में बिना देर किए डाल दे, लेकिन शेखर था कि वो बस अपनी उंगली को ही मेरी चूत के अंदर सटासट चलाए जा रहा था।

फिर एक दो बार तो मुझे ऐसा लगा कि जैसे में उसकी उंगली की करामात से ही झड़ जाउंगी, लेकिन यह एक आधा अधूरा सपना होता जो कि में नहीं चाहती थी और इसलिए मैंने उसी समय अपनी दोनों आखों को खोल दिया और में शेखर को देखने लगी थी। अब मेरी नींद खुलती हुई देखकर शेखर एकदम से घबरा गया वो जल्दी से अपनी पेंट को चढ़ाकर वहां से बाहर भागने लगा था, लेकिन मैंने झपटकर उसको उसी समय पकड़ लिया था और में उसके लंड को अपनी मुठ्ठी में मसलते हुए उससे बोली क्यों तुम बहुत देर से मेरे साथ खिलवाड़ कर रहे हो, लेकिन अब तुम कहाँ भागकर जा रहे हो? तो वो सिसकते हुए बोला कि मामी जी प्लीज आप इसको छोड़ दीजिए, मुझसे बड़ा तेज दर्द हो रहा है। अब में उससे बोली कि तुम इतनी देर से मेरे अंगों को मसल रहे थे, तब यह अब तुमने नहीं सोचा कि मुझे भी दर्द हो रहा होगा? और अब में तुझे नहीं छोड़ने वाली, मैंने मुस्कुराकर उससे कहा और अब में उसके लंड की खाल को आगे पीछे करने लगी थी। तो वो कहने लगा कि प्लीज़ आप मुझे जाने दीजिए अब मुझसे ऐसी कोई भी ग़लती फिर कभी नहीं होगी, तब में हंसते हुए उससे बोली कि यह बात नहीं है मेरे प्यारे मुन्ना, में चाहती हूँ कि तुम इस तरह की गलतियाँ हर रोज करो करो, जैसे ही तुम्हारे मामा जी उसके ऑफिस चले जाते है वैसे ही तुम मेरे पास आ जाया करो मुझे तुम्हारे साथ यह सब करने में बड़ा मज़ा आएगा, लेकिन मामी जी कहकर शेखर ने कुछ कहना चाहा तो में उसको डांटकर बोली क्या मामी जी मामी जी लगा रखी है? इस समय में सिर्फ़ एक औरत हूँ और तुम एक मर्द इसलिए तुम अब मेरे साथ उसी तरह से पेश आओ चलो आओ अब तुम मेरे ऊपर लेट जाओ। फिर शेखर अपने संकोच भरे स्वर में बोला कि मामी जी में कुछ भी करना नहीं जानता, क्योंकि आज से पहले में कभी भी किसी लड़की के साथ इस तरह से नहीं लेटा, यह सब आज में पहली बार आपके ही साथ कर रहा हूँ और मुझे इस काम का बिल्कुल भी अनुभव नहीं है।

फिर मैंने उससे कामुक स्वर में कहा कि यह तो और भी अच्छी बात है कि तुम्हारा यह कुँवारापन आज पहली बार मेरे ही हाथों से टूटेगा। अब तुम चुपचाप मेरे ऊपर लेट जाओ और बाकी का सब काम में अपने आप कर लूँगी। फिर मेरे मुहं से यह बात सुनकर शेखर मेरे ऊपर आकर लेट गया और उसका लंड अब तक बहुत मोटा और लंबा भी हो गया था। मैंने उसको अपनी चूत पर सीधा रख लिया और अपनी कमर का एक जोरदार प्रहार करके मैंने उसके लंड को अपनी चूत की गहराइयों में एक ही बार में पूरा अंदर उतार लिया। उसके बाद में शेखर के गोरे नर्म कूल्हों को थामकर में अपनी कमर को आगे पीछे करके चलाने लगी थी। मेरी चूत के घर्षण से उसको भी कुछ देर बाद बहुत आनंद आ रहा था। इसका प्रमाण था कि उसकी गहरी साँसे जो मेरे हर एक प्रहार के साथ और तेज भी होती जा रही थी। में लगातार ज़ोर ज़ोर से धक्के लगा रही थी और फिर कुछ देर धक्के देने के बाद मेरी उत्तेजना अब धीरे धीरे अपनी चरम सीमा पर पहुँचती जा रही थी।

फिर तभी अचानक से मुझे अब अपनी चूत में कुछ गरम गरम द्रव्य गिरता हुआ महसूस होने लगा और फिर में तुरंत समझ गई कि मेरे करारे धक्को ने शेखर के लंड को उसके अंदर के लावे को बाहर निकालने पर मजबूर कर दिया है, लेकिन मेरी चूत अभी तक पूरी तरह से तृप्त नहीं हुई थी। उसी समय शेखर के लंड को अपनी चूत से बाहर करके मैंने अपनी उँगलियों से ही अपनी चूत को नोचना खरोचना शुरू कर दिया था। फिर वो मुझसे बोली कि मामी जी आपका बदन कितना प्यारा सुंदर है और उस समय शेखर मेरी चूत को अपनी प्यासी नजरों से लगातार देख रहा था और अब वो कहने लगा कि मेरा मन करता है कि में इसके होठों को अपने होंठो से दबा लूँ और इसको जमकर चूसकर इसका पूरा रस पी जाऊँ। फिर उसके मुहं से यह बात सुनकर मन ही मन बहुत खुश होकर सिसककर उससे बोली वाह मुन्ना नेकी और पूछ पूछ में और फिर तुरंत ही शेखर के बाल खींचते हुए मैंने उसका चेहरा जबरन ही अपनी दोनों जांघो के बीच में दबा लिया। फिर उसी समय शेखर कसमसाकर बोला कि मामी जी अब आप मुझे छोड़ दीजिए, मेरा दम घुट रहा है। अब मैंने उससे उत्तेजना में सिसककर बोला कि हाँ में तुझे जरुर छोड़ दूँगी मेरे राजा, पहले तू अपनी इस जीभ से मेरी इस प्यासी सहेली को पुचकार तो दे और फिर में अपनी गीली चूत की फांके शेखर के होंठो पर गाल पर तथा उसकी नाक पर रगड़ने लगी थी।

फिर तभी उसी समय शेखर ने मेरी उस बैचेनी को पूरी तरह से भाँप लिया था और वो अब अपनी जीभ से मेरी चूत को चाटने के साथ साथ चोदने भी लगा था। उसके ऐसा करने की वजह से में अब उत्तेजना के आकाश में गोते लगाने लगी थी। मुझे बड़ा मस्त मज़ा आ रहा था। फिर कुछ देर बाद मैंने भी अब अपने एक हाथ से उसके लंड को पकड़कर हिलाना शुरू किया जो कुछ ही देर में तनकर खड़ा हो चुका था, लेकिन तभी अचानक से शेखर ने अपने दाँत मेरी फांको पर गाड़ा दिए और उसकी इस हरकत ने मेरे चक्के छुड़ा दिए थे, उसी समय में सिसकते हुए झड़ने लगी थी और उस समय मेरी उत्तेजना इतनी जबरदस्त थी कि मेरा लावा बहता हुआ मेरी चूत के बाहर निकल आया था और मैंने कुछ देर बाद अपने हाथ पर उसके गरम गरम चिकने वीर्य को महसूस किया। वो बहुत ज्यादा मात्रा में था और उसकी वजह से मेरा पूरा हाथ भर गया। में तब भी उसके लंड को उसके वीर्य से पूरा गीला करके वैसे ही हिलाती रही। फिर मामी जी यह सब क्या हुआ शेखर ने बड़े ही अचरज से उस पारदर्शी द्रव्य को घूरते हुए मुझसे पूछा और फिर में शेखर से चिपकते हुए बोली कि यह मेरा नशा है मुन्ना जो मेरे ज्यादा गरम हो जाने की वजह से मेरे बदन से बहकर बाहर निकल गया है, क्योंकि आज तो तूने अपनी मामी के इस शरीर की पूरी गरमी झाड़ दी है, तेरी कसम आज मुझे बड़ा मस्त मज़ा आ गया, तू बहुत अच्छा है। सच बताऊँ मामी जी आपकी कसम मुझे भी आपके साथ ऐसा करके बड़ा मज़ा आया और इतना कहकर अब शेखर अपने चेहरे को मेरे बूब्स पर रगड़ने लगा था। अब में उससे बोली कि यह मज़ा तो में तुझे हर रोज दे सकती हूँ मुन्ना, लेकिन उसके लिए तुम्हे मेरा कहना मानना होगा और उसके बाद तो तुम्हे इससे भी ज्यादा मस्त मज़े आएगें। फिर उसी समय शेखर ने कहा कि हाँ ठीक है आज के बाद में वही सब करूँगा जो आप मुझसे कहेंगी, आप मुझे बताती जाए में वो काम करता रहूँगा, क्योंकि मुझे भी यह सब आपके साथ करके मज़े लेने है। दोस्तों उस दिन के बाद से आज तक शेखर बस मेरे कहने पर चलता रहा और उसकी वजह से मेरे उसके साथ वो संबंध बहुत अच्छी तरह से अब भी बने हुए है और मैंने शेखर के कई दोस्तों से भी अपनी चूत की भूख को शांत किया और अब में और भी ज्यादा मज़े का इतंजार कर रही हूँ।

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दोस्तों यह थी मेरी वो सच्ची घटना में जिसके बारे में आप सभी को बहुत समय से बनाने के बारे में विचार कर रही थी, लेकिन आज में इसको लिखकर आप सभी तक पहुँचाने में सफल हो चुकी हूँ मुझे उम्मीद है कि यह कहानी सभी पढ़ने वालो को जरुर पसंद आएगी ।।

धन्यवाद …

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